Monday, July 15, 2013

कई दिनों से तुझसे मुलाकात नहीं हुई
के फिर एक गज़ल लिख्नने बैठी हूँ आज
अरसों से खुद की तलाश नहीं हुई

छू कर आई हूँ नूर-ए-यार को,
तू मेरे बदलते मिजाज़ तो देख
शोखियों में ङूबी हैं तार तार,
इन झुकी पलकों के राज़ तो देख

Friday, September 5, 2008

तेरी दीवानी हुई

कभी दुआ बन कर पलको पे छाये
कभी प्यास बन कर लबों पे आये
कभी दिल की राह से गुजर गये
देखा तुझे तो खुद को भूल गई

कतरा-कतरा तेरी हुई
मैं दीवानी हुई तेरी दीवानी हुई


तेरी आँखों की दुनिया में
देखा एक सपना मेरा भी
मुझसे तेरा फ़र्क मिटा
जब से तुझ सी हुई

कतरा-कतरा तेरी हुई
मैं दीवानी हुई तेरी दीवानी हुई


चेहरों पे चेहरे चढ़े
पास बैठे अपने बने
इश्क़ की शब में
बेख़ुदी का हाल ऐसा
जहाँ मिले तेरे निशान
ज़िंदगी की सहर हुई

कतरा-कतरा तेरी हुई
मैं दीवानी हुई तेरी दीवानी हुई

Tuesday, September 2, 2008

शायरी



छू कर आई हूँ रूह-ए-यार को
तू मेरे बदलते अन्दाज़ तो देख
शोखियों में डूबी हैं तार तार
इन झुकी पल्कों के राज़ तो देख
...

Tuesday, March 4, 2008

शब्द

क़्या तुम्हारे आँगन में अपना
पहला कदम रख सकता हूँ
शब्द हूँ मैं तुम्हारे लबों का
क्या तुमसे व्यक्त हो सकता हूँ...


अपनी मर्यादा में कसकर बंधा हुआ हूँ
ऊँच नीच जाति भेद में तुला हुआ हूँ
क्या मैं तुम्हारे पंखों का आत्मसात कर
खुले गगन में उङने का आभास कर सकता हूँ

शब्द हूँ मैं तुम्हारे लबों का...


भुलाया हुआ चैतन्य परमार्थी हूँ
तुम्हारी पहचान का सच्चा सार्थी हूँ
क्या तुममें बस प्रेम का आवाहन कर
तुम्हें पिरो जीवन के धागे में गा सकता हूँ

शब्द हूँ मैं तुम्हारे लबों का...

Thursday, November 22, 2007

गज़ल



सफर कटता रहा नजारे गुजरते रहे
निगाहें बोझिल हुईं हम सोचते रहे

इश्क़ और फर्ज़ की कशमकश में
दामन को अश्कों से निचोडते रहे

आहटें कुछ सुनी झोके वो धूल के
बाबस्ता दरीचे दिल के खोलते रहे

गुबार सन्नाटों में कहाँ निकालते
बेखुदी में एक आस खरोचते रहे

वफा ही वफा थी हर तरफ घेरे
हाथ थामने वाले ही कुचलते रहे

मैं ज़र्ब गज़ल उस शायर की जिसे
अधूरी लिख कर वो गुनगुनाते रहे

हम अपना आशियाना कहाँ बसाते
उसके घर के पते ही बदलते रहे

पानी से भरी पलकों को झुकाकर
आँखों के मिजाज़ सम्भलते रहे

वो समझे इन्तेख्वाब नहीं उनका
हम जो दिन रात उनमें ढलते रहे

जान बाकी है ज़ुम्बिश भी बदन में
लाजमी है कि थोडा यूँ मचलते रहे

इश्क़ के मारे सुकून तलाशें दरबदर
तेरी रहगुजर है मंजिल,सो चलते रहे